Hi Friends!!
This blog is nothing but just an attempt to pass my spare time. In straight words, I am trying to pass my boredom to the blog. Boriyat Is Guaranteed. So, go through this at your own RISK!!
HAPPY READING!! :)
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Monday, March 18, 2013
Thursday, July 19, 2012
ज़िंदगी तुझे समझना इतना मुश्किल क्यूँ है....
जीते भी तुझे हैं, जीते भी तेरे लिए हैं, फिर भी
ज़िंदगी तुझे समझना इतना मुश्किल क्यूँ है..
समझने की कोशिश ना करूँ, मन नहीं मानता
और तुझे समझ पाऊँ, ये तू होने नहीं देती..
दिल के दरवाज़े खोलूं अगर, तो पलट कर कोई देखता तक नही,
जो बंद कर लूँ, तो दस्तकें जीने नही देती..
ज़िंदगी तुझे समझना इतना मुश्किल क्यूँ है....
Tuesday, July 19, 2011
क्या करूँ?
खुली हवा सा बहना भी नहीं आता, क्या करूँ?
क्या करूँ जो मेरे हौंसलों मे दम नहीं,
कलाकारों की तरह, बनावटी मुस्कान लाना भी नही आता, क्या करूँ?
समाज के तौर तरीकों की समझ तो है,
पर उनमें खुद को ढालना नहीं आता, क्या करूँ?
जीवन क रास्ते टेढ़े हैं, पता है,
सीधे रास्तों पे भी चलने का सहूर नहीं, क्या करूँ?
दुनिया गर दीवानों की है, तो दीवाना मैं भी हूँ|
दीवानगी जतानी नहीं आती, क्या करूँ?
दोस्त भी हैं, उनका साथ भी है,
मुझे ही दोस्ती निभानी नही आती,क्या करूँ?
दुनिया छोटी है, पढ़ा था कहीं,
मुझे मेरे मन ही का छोर नहीं मिलता, क्या करूँ?
ईश्वर यहीं है, सारे सुख भी यहीं,
मुझे मैं ही नहीं मिलता, क्या करूँ?
खैर, ये मेरे सवाल, मुझसे ही हैं,
जिनके जवाब ढूढ़ना, काम फ़िज़ूल का है|
गरमा-गरम चाय और पकोड़ो के साथ बारिश का मज़ा लो,
मेरा तो ये रोज़ का है!!
हा हा..Tuesday, June 28, 2011
महज़ चंद पंक्तियाँ !!

No poem this time. Just a few lines...
ये भीड़, ये चका-चौंध, ये गाड़ियों का शोर,
अब अजनबी नही लगते.
गर इनमे इंसान और उसके सपनो की अहमियत ना खोई होती,
तो बात और होती..
शुक्रिया कहूँ, या इल्ज़ाम दूँ तुम्हे,
की तुम हर दम साथ थी मेरे,
और मैं तुम्हारे साथ को हर पल तरसता रहा.
जश्न मे लोगों को झूमते हुए देखा,
अपनी नही, दूसरो की कामयाबी पे,
खुद को भूलते हुए देखा...
जो खुद की जीत भी मीठी नही लगती,
तो इसमे कसूर तो मेरा ही है..
कभी शौक था मोटे उपन्यास पढ़ने का,
जो सिमट गया कहानियों तक.
शौक और सिमटा तो कहानियाँ भी सताने लगी,
और दायरा सिमटा कविताओं तक.
दोष दुनिया का मानूं, शौक का,
या अपने नाकारेपन को इल्ज़ाम दूँ,
जो अब मुझे सिर्फ़ पंक्तियाँ सुहाती हैं.
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